बिजली खर्च शून्य, पानी की सप्लाई लगातार; डिंडोरी के मॉडल की हो रही सराहना
डिंडौरी: एक ओर जहां डिंडौरी जिले के कई इलाके भीषण जलसंकट से जूझ रहे हैं और करोड़ों रुपये की सरकारी नल-जल योजनाएं तकनीकी खामियों के चलते सफेद हाथी साबित हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ सीमा से लगे वनग्राम कपोटी के ग्रामीणों ने जल संरक्षण और आत्मनिर्भरता की एक अद्भुत मिसाल पेश की है। यहाँ के ग्रामीणों ने विज्ञान के साधारण नियम (गुरुत्वाकर्षण) का उपयोग कर बिना बिजली, बिना मोटर और बिना किसी सरकारी तामझाम के हर घर तक शुद्ध पेयजल पहुंचाकर सबको हैरान कर दिया है।
कुदरत का तोहफा और ग्रामीणों का दिमाग: 24 घंटे मिलता है पानी
करंजिया जनपद क्षेत्र के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों के बीच बसे वनग्राम कपोटी में विशेष संरक्षित बैगा जनजाति के परिवार निवास करते हैं। गांव से लगभग आधा किलोमीटर दूर जंगल की वादियों में एक प्राकृतिक जलस्रोत (झरना) बहता है, जिसमें साल भर पानी रहता है।
कैसे काम करता है यह 'कपोटी मॉडल'?
चूंकि यह जलस्रोत ऊंचाई पर स्थित है और गांव ढलान पर, इसलिए ग्रामीणों ने करीब आठ वर्ष पहले 'गुरुत्वाकर्षण आधारित नल-जल प्रणाली' (Gravity-based Water System) विकसित की। ऊंचाई से गिरने वाले पानी के प्राकृतिक दबाव का उपयोग करके पाइपलाइनों के जरिए पानी सीधे घरों तक पहुंचाया जाता है। इसमें न तो बिजली का एक रुपया खर्च होता है और न ही किसी मोटर के रखरखाव की जरूरत पड़ती है।
जब ग्रामीणों ने खुद उठाई जिम्मेदारी: NGO के साथ मिलकर बदला इतिहास
ग्राम पंचायत चकमी के सरपंच निर्भय सिंह तेकाम ने बताया कि 8 साल पहले तक इस गांव में भी पेयजल का भयावह संकट था। गर्मियों में बैगा परिवारों को बूंद-बूंद पानी के लिए मीलों भटकना पड़ता था। इसके बाद ग्रामीणों ने एक गैर-सरकारी संस्था (NGO) के साथ मिलकर अपनी तकदीर खुद बदलने का फैसला किया:
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सामूहिक श्रमदान: ग्रामीणों ने न केवल आपस में चंदा इकट्ठा किया, बल्कि खुद कुदाल-फावड़ा उठाकर घने जंगलों के बीच पाइपलाइन बिछाई।
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फिल्टर और टैंक निर्माण: पानी को स्वच्छ करने के लिए प्राकृतिक फिल्टर और स्टोरेज टैंक बनाए गए।
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आर्थिक समृद्धि: आज इस योजना की बदौलत गांव के हर घर में 12 महीने शुद्ध पानी मिल रहा है। पानी की प्रचुरता के कारण अब ग्रामीण पीने के साथ-साथ बड़े पैमाने पर सब्जी उत्पादन और घरेलू खेती भी कर रहे हैं, जिससे उनकी आय बढ़ी है।
अब 'कपोटी मॉडल' से पड़ोसी गांवों की भी बुझेगी प्यास
कपोटी गांव की इस ऐतिहासिक सफलता और दूरदर्शिता को देखते हुए अब सरकारी महकमा भी हरकत में आया है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) इस सफल मॉडल से प्रेरणा लेकर अब इसी प्राकृतिक जलस्रोत के जरिए लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित चकमी गांव तक पाइपलाइन बिछाकर पेयजल पहुंचाने की मेगा योजना पर काम कर रहा है।
जहां आज के दौर में पानी को लेकर विवाद और हाहाकार आम बात हो गई है, वहीं कपोटी के वनवासियों ने एकजुटता और जल संरक्षण के बल पर समस्या का स्थायी समाधान खोज निकाला है। यह स्वदेशी मॉडल न केवल डिंडौरी बल्कि पूरे मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के लिए जल प्रबंधन (Water Management) का एक सर्वश्रेष्ठ और अनुकरणीय उदाहरण बनकर उभरा है।


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