बिना गोत्र के अधूरी है पूजा! जानें कैसे करें अपने गोत्र की पहचान
किसी की पहचान सिर्फ उसके नाम या गांव से नहीं होती बल्कि हमारे पुरखों की परंपरा और ऋषियों की स्मृति भी उसमें जुड़ी होती है, यही संबंध गोत्र कहलाता है. यह सिर्फ एक पारिवारिक नाम नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों से जुड़ी हुई एक पवित्र परंपरा है, जो आज भी विवाह, उपनयन संस्कार और पूजा-पाठ जैसे कई धार्मिक कार्यों में अनिवार्य रूप से पूछी जाती है. गोत्र व्यक्ति के आध्यात्मिक वंश को बताता है, जैसे सरनेम से सामाजिक पहचान होती है, वैसे ही गोत्र से ऋषि परंपरा की. लेकिन कई बार पूजा अर्चना के समय पंडितजी गोत्र पूछते हैं, कुछ लोगों को गोत्र के बारे में जानकारी होती है तो कुछ लोगों को नहीं. ऐसे में आप इस आर्टिकल के माध्यम से अपने गोत्र के बारे में जान सकते हैं और पूजा अर्चना में यह नाम ले सकते हैं…
क्यों जरूरी है गोत्र?
हिंदू धर्म में समान गोत्र में विवाह वर्जित होता है, इसे सगोत्र विवाह निषेध कहा जाता है. इसका उद्देश्य रक्त संबंधी विवाह से बचना है, जिससे आनुवंशिक दोष न बढ़ें. गोत्र का उपयोग पितरों का तर्पण और श्राद्ध करते समय आवश्यक होता है, जिससे वे सही आत्मा तक पहुंच सकें. साथ ही गोत्र का उच्चारण पूजा, संकल्प और हवन आदि में किया जाता है, जैसे ‘मम गोत्र फलाने ऋषेः…’ यह बताता है कि हम किस ऋषि परंपरा से हैं और उसी के अनुसार अनुष्ठान किया जाता है. हिंदू धर्म में माना जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी सप्तर्षि या उनके वंशज से उत्पन्न है। उसी ऋषि का नाम व्यक्ति के गोत्र के रूप में चलता है. उदाहरण के लिए भारद्वाज गोत्र, वशिष्ठ गोत्र, कश्यप गोत्र, अत्रि गोत्र आदि.
ब्रह्माजी के 10 मानस पुत्र
ब्रह्माजी ने सृष्टि के निर्माण से पहले 10 मानस पुत्र उत्पन्न किए, जिनके नाम हैं: ऋषि मरीचि, ऋषि अत्रि, ऋषि अंगिरा, ऋषि पुलस्त्य, ऋषि पुलह, ऋषि क्रतु, ऋषि भृगु, गुरु वशिष्ठ, दक्ष और नारद. इन 10 मानस पुत्रों के अलावा, सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार को भी ब्रह्माजी का मानस पुत्र माना जाता है. ये सभी मानस पुत्र ब्रह्माजी की इच्छा से उनके मन से उत्पन्न हुए थे इसलिए इनको मानस पुत्र कहा जाता है.
ऋषि कश्यप की 13 पत्नियां
ऋषि मरीचि के पुत्र हुए ऋषि कश्यप थे और इनको सृष्टि के रचयिता के रूप में भी जाना जाता है. वहीं पुराणों में, प्रजापति दक्ष की 60 पुत्रियों का उल्लेख है, जिनका विवाह विभिन्न देवताओं और ऋषियों से हुआ था. जिनमें 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से, 10 पुत्रियों का विवाह धर्म से और 13 पुत्रियों का विवाह ऋषि कश्यप हुआ. सति का विवाह भगवान शिव और बाकी की पुत्रियों के विवाह अलग अलग ऋषि-मुनि और देवताओं से हुए. यही संबंध सृष्टि की रचना के आधार बने. इन्हीं विवाहों से ही संसार के सभी प्राणी उत्पन्न हुए, जिनमें देवता, असुर और मनुष्य शामिल हैं.
पूरी सृष्टि का हुआ निर्माण
ऋषि कश्यप की 13 पत्नियां थीं, जिनमें अदिती और दिति प्रमुख थीं. अदिती से देवताओं यानी आदित्यों का जन्म हुआ, जिनमें से सूर्यदेव ब्रह्मांड की ऊर्जा का मुख्य स्त्रोत बने और इंद्र, देवताओं के राजा बने. वहीं दिति से असुरों का जन्म हुआ, जिनमें सबसे बड़े हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप थे. अदिति से आदित्य (सूर्य, इंद्र, जल, अग्नि, धर्म सहित 12 पुत्र), दिति से दैत्य (असुर), दनु से दानव, कद्रू से नागों, विनता से गरुड़ और वरुण, अरिष्टा से गंधर्व, मुनि से अप्सराएं, इला से वृक्ष, लताएं आदि वनस्पतियों का जन्म, सुरासा से नागों के दूसरे वंश, काष्ठा से घोड़े आदि एक खुर वाले पशु, सुराभि से गौ माताएं, भैंस, क्रोधवशा से विष वाले जीव अर्थात बिच्छू जैसे, इरा से रेंगने वाले जीवों को जन्म दिया, ताम्रा से बाज, गिद्ध आदि शिकारी पंक्षी.
मनु की वजह से कहलाए मनुष्य
ऋषि कश्यप के पुत्र विस्वान से वैवस्वत मनु का जन्म हुआ, जो हिंदू धर्म के अनुसार, संसार के प्रथम पुरुष थे और इनसे ही मनुष्य का जन्म हुआ. मनु की संतान होने की वजह से ही मनुष्य कहा जाता है. जितने भी देवता, पशु, पक्षी, असुर, मनुष्य हैं, ये सभी आपस में भाई बहन ही हैं. एक ऋषि कश्यप की ही हम सभी संतान हैं. इसलिए अगर आप पूजा पाठ करवा रहे हों और गोत्र पता ना हो तो आप कश्यप गोत्र कहकर भी पूजा अर्चना कर सकते हैं. वहीं अगर आपको अपना गोत्र पता है तो यह और भी अच्छी बात है.
भारत में प्रचलित प्रमुख गोत्र
कश्यप गोत्र
भारद्वाजगोत्र
वशिष्ठगोत्र
अत्रि गोत्र
गौतम गोत्र
वत्स गोत्र
जमदग्नि गोत्र
विश्वामित्र गोत्र


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