ब्रिटेन में इस्लामोफोबिया की परिभाषा पर संकट
लंदन । ब्रिटेन में इस्लामोफोबिया यानी मुसलमानों के खिलाफ नफरत को परिभाषित करने को लेकर सरकार की असमर्थता एक बार फिर चर्चा में है। फरवरी 2025 में ब्रिटिश सरकार ने “मुस्लिम विरोधी नफरत/इस्लामोफोबिया” की परिभाषा तय करने के लिए एक कार्यसमूह बनाया था, जिसे अगस्त तक अपनी रिपोर्ट देनी थी। लेकिन अब तक कोई स्पष्ट परिभाषा सामने नहीं आई है।
हाल ही में बीबीसी की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि सरकार इस परिभाषा में “इस्लामोफोबिया” शब्द का ही इस्तेमाल नहीं करेगी और उसकी जगह “मुस्लिम विरोधी शत्रुता” जैसे शब्दों को चुना जाएगा। विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह कदम बेहद कमजोर और खतरनाक है, क्योंकि इससे इस्लाम के खिलाफ नफरत को अनदेखा किया जा सकता है। लेखक और इतिहासकार जेम्स रेंटन के अनुसार, मुसलमानों के खिलाफ नस्लवाद की जड़ में इस्लाम से नफरत ही है। ऐसे समय में, जब ब्रिटेन में मुसलमानों पर हमलों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, सरकार का इस मुद्दे से बचना गंभीर चिंता का विषय है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इंग्लैंड और वेल्स में मुसलमानों के खिलाफ धार्मिक नफरत से जुड़े अपराधों में पिछले दो वर्षों में तेज़ बढ़ोतरी हुई है। मार्च 2024 तक इन मामलों में 13 प्रतिशत और मार्च 2025 तक 19 प्रतिशत की और वृद्धि दर्ज की गई। विशेषज्ञों का कहना है कि ये आंकड़े वास्तविक स्थिति से कम हो सकते हैं। आलोचकों का आरोप है कि ब्रिटिश सरकार यहूदी विरोधी नफरत के खिलाफ तो सख्त रुख अपनाती है, लेकिन मुसलमानों की सुरक्षा और इस्लामोफोबिया को लेकर वैसा ही राजनीतिक संकल्प नहीं दिखाती। 2016 में सरकार ने यहूदी विरोधी नफरत की एक अंतरराष्ट्रीय परिभाषा अपनाई थी, लेकिन इस्लामोफोबिया के मामले में अब भी टालमटोल जारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सरकार इस्लामोफोबिया को साफ शब्दों में परिभाषित नहीं करेगी, तब तक मुसलमानों के खिलाफ बढ़ती नफरत और हिंसा को प्रभावी ढंग से रोका नहीं जा सकेगा।


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