93 वी जयंती पर विशेष (23 जुलाई)

हुकमचंद कछवाय : जनसंघ के तप से निकला एक तपस्वी जनप्रतिनिधि जिन्होंने संसद में 70 के दशक में परमाणु बम का मुद्दा उठाया, मुरैना में 32 डाकुओं का आत्मसमर्पण कराया, लोकसभा में 32 हजार प्रश्न उठाये और कपड़ा मिल श्रमिको के लिए इंदिरा गांधी जी के कार के आगे लेट गए

— डॉ. नवीन आनंद जोशी (भोपाल)

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन का इतिहास नहीं है, बल्कि उन जननायकों की तपस्या का इतिहास भी है जिन्होंने राजनीति को सेवा, संघर्ष और समर्पण का माध्यम बनाया। ऐसे ही विरले जनप्रतिनिधियों में एक नाम है हुकमचंद कछवाय का, जिनका जीवन जनसंघ की वैचारिक तपस्या से निकलकर जनसेवा के सर्वोच्च आदर्शों तक पहुँचा। उनकी जन्मजयंती पर उन्हें स्मरण करना केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति को नमन करना है जिसमें जनता सर्वोपरि थी और जनप्रतिनिधि स्वयं को जनता का सेवक मानता था। उज्जैन की धरती ने अनेक विभूतियों को जन्म दिया है, किंतु हुकुमचंद कच्छवाय का व्यक्तित्व अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। वे केवल सांसद नहीं थे, बल्कि जनता की आवाज़, संघर्ष की पहचान और लोकतांत्रिक मूल्यों के सजग प्रहरी थे। जनसंघ के संस्थापक कार्यकर्ताओं में उनकी सक्रिय भूमिका रही। संगठन की जड़ों को सींचने में उनका योगदान इतना महत्वपूर्ण था कि उन्हें राजनीतिक गलियारों में सम्मानपूर्वक “कोरम किंग” कहा जाता था। संसद की कार्यवाही, संसदीय नियमों और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर उनकी अद्भुत पकड़ थी। संसद में उनका व्यक्तित्व निर्भीकता और स्पष्टवादिता का प्रतीक था। जब उन्हें लगा कि किसी विषय पर देशहित और भारतीय भाषाओं के सम्मान की अनदेखी हो रही है, तब उन्होंने अंग्रेज़ी से जुड़े एक विधेयक की प्रति सदन में जलाकर अपना विरोध दर्ज कराया। यह केवल विरोध का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि भारतीय अस्मिता और स्वाभिमान के पक्ष में उनका वैचारिक उद्घोष था। उस दौर में यह साहस असाधारण माना गया और पूरे देश का ध्यान उनकी ओर गया। उनकी संसदीय सक्रियता का प्रभाव इतना व्यापक था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी उनकी तैयारी, तार्किकता और जनता के प्रति समर्पण से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। कहा जाता है कि नेहरू ने उनकी संसदीय क्षमता की सराहना करते हुए उन्हें आदर्श जनप्रतिनिधियों में गिना। यह लोकतंत्र की वह खूबसूरत परंपरा थी जहाँ वैचारिक मतभेद होने के बावजूद प्रतिभा और जनसेवा का सम्मान किया जाता था।

बाद के वर्षों में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी भी उनके संघर्षशील व्यक्तित्व की साक्षी बनीं। उज्जैन प्रवास के दौरान जब श्रमिकों की माँगों की अनदेखी हुई, तब हुकुमचंद कच्छवाय तपती दोपहर में सड़क पर इंदिरा गांधी के काफिले के सामने लेट गए। उनका उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि श्रमिकों की पीड़ा को देश के सर्वोच्च नेतृत्व तक पहुँचाना था। जब तक श्रमिकों की बात सुनी नहीं गई, वे अपने स्थान से नहीं हटे। अंततः उनकी माँगों पर विचार हुआ और तब जाकर उन्होंने अपना आंदोलन समाप्त किया। यह घटना बताती है कि उनके लिए राजनीति पद प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनसंघर्ष का संकल्प थी। हुकुमचंद कच्छवाय की पहचान केवल संसद तक सीमित नहीं थी। उज्जैन की गलियों से लेकर दिल्ली की सड़कों तक वे आम नागरिकों के बीच सहजता से मिलते-जुलते दिखाई देते थे। उनके दरवाज़े पर किसी परिचय, सिफारिश या औपचारिकता की आवश्यकता नहीं होती थी। गरीब, मजदूर, किसान, व्यापारी, विद्यार्थी या कर्मचारी—हर वर्ग का व्यक्ति उन्हें अपना प्रतिनिधि मानता था। वे जनसमस्याओं को सुनते ही नहीं थे, बल्कि समाधान होने तक निरंतर प्रयास करते थे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी उनकी संसदीय सक्रियता, अध्ययनशीलता और संगठनात्मक क्षमता के प्रशंसक थे। जनसंघ के कठिन दिनों में उन्होंने जिस निष्ठा और समर्पण से संगठन को मजबूत किया, वह आज भी राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का विषय है। उन्होंने कभी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को संगठन और जनता से ऊपर नहीं रखा। यही कारण है कि उनका राजनीतिक जीवन निष्कलंक और सम्मानजनक माना जाता है। आज का राजनीतिक परिवेश अनेक मायनों में बदल चुका है। जनप्रतिनिधियों और जनता के बीच सुरक्षा घेरे, औपचारिकताएँ और दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। अनेक जनप्रतिनिधि आम नागरिकों तक सहज पहुँच से दूर दिखाई देते हैं। ऐसे समय में हुकुमचंद कच्छवाय का जीवन हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता के बीच रहने, उनकी पीड़ा को समझने और उनके संघर्ष को अपना संघर्ष मानने में निहित है।वे उन नेताओं में थे जो सुरक्षा घेरों में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में स्वयं को सुरक्षित महसूस करते थे। उनका कार्यालय किसी आलीशान भवन में नहीं, बल्कि जनता के बीच था। उनके लिए संसद केवल भाषण देने का मंच नहीं, बल्कि जनभावनाओं को अभिव्यक्ति देने का पवित्र दायित्व था। उन्होंने जनप्रतिनिधित्व को तपस्या बनाया और स्वयं तपस्वी की तरह जीवन जिया। हुकुमचंद कच्छवाय का जीवन भारतीय लोकतंत्र की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें संघर्ष था, सिद्धांत थे, सादगी थी और सबसे बढ़कर जनता के प्रति अटूट निष्ठा थी। उनकी जन्मजयंती हमें यह संदेश देती है कि राजनीति का सर्वोच्च आदर्श सत्ता नहीं, बल्कि सेवा है; पद नहीं, बल्कि जनविश्वास है; और लोकप्रियता नहीं, बल्कि जनकल्याण के लिए निरंतर समर्पण है। आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी के जनप्रतिनिधि हुकुमचंद कच्छवाय जैसे नेताओं के जीवन से प्रेरणा लें। यदि राजनीति पुनः सेवा, संवेदना और संघर्ष की राह पर लौटेगी, तभी लोकतंत्र और अधिक सशक्त होगा तथा जनता का विश्वास भी पहले की तरह अटूट बना रहेगा।हुकुमचंद कच्छवाय को उनकी जन्मजयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि एवं शत-शत नमन।