डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर, एक्सपर्ट्स ने बताई आगे की संभावित दिशा
मुंबई: वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और घरेलू बाजार में डॉलर की बढ़ती मांग के बीच अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया ऐतिहासिक गिरावट के बेहद करीब पहुंच गया है। वित्तीय बाजार के जानकारों का मानना है कि कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों, विदेशी निवेशकों द्वारा लगातार पूंजी निकालने और देश के व्यापार असंतुलन जैसे बहुआयामी कारणों से रुपये की सेहत लगातार बिगड़ रही है। गौरतलब है कि गत 20 मई को रुपया डॉलर के मुकाबले 96.83 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ था और आज शुक्रवार को यह 96.30 के स्तर पर कारोबार कर रहा है, जो इसके सर्वकालिक निचले स्तर से महज 0.55 प्रतिशत की दूरी पर है।
कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाईं संरचनात्मक चुनौतियां
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल ने रुपये पर दबाव बनाने में एक तात्कालिक उत्प्रेरक (ट्रिगर) का काम किया है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करता है, जिससे चालू खाता घाटा (करंट अकाउंट डेफिसिट) बढ़ना स्वाभाविक है। इसके साथ ही मजबूत होता अमेरिकी डॉलर, चीन द्वारा की जा रही आक्रामक डंपिंग और वैश्विक निर्यात में आ रही बाधाओं ने मिलकर भारतीय मुद्रा की रिकवरी की उम्मीदों को करारा झटका दिया है, जिससे रुपया इस महीने एशियाई मुद्राओं में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गया है।
विदेशी पूंजी की निकासी और डॉलर की आवक में कमी
भारतीय शेयर और ऋण बाजार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) द्वारा बड़े पैमाने पर की जा रही बिकवाली ने संकट को और गहरा कर दिया है। आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से चालू वर्ष में 36 अरब डॉलर से अधिक की निकासी की है, क्योंकि वैश्विक निवेश का रुख अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और सेमीकंडक्टर जैसे उन्नत क्षेत्रों की तरफ बढ़ रहा है। वहीं दूसरी ओर, रिजर्व बैंक द्वारा अनिवासी भारतीयों के लिए घोषित की गई विशेष जमा योजनाओं (FCNR-B) के तहत भी अनुमान से काफी कम विदेशी निवेश हासिल हुआ है, जिससे रुपये को मिलने वाला तात्कालिक सहारा कमजोर पड़ गया है।
आयातकों की आक्रामक हेजिंग से डॉलर पर बढ़ा दबाव
मुद्रा बाजार में इस समय डॉलर की मांग और आपूर्ति का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है। भू-राजनीतिक तनाव और रक्षा भुगतानों के कारण डॉलर की मांग लगातार चरम पर है, जबकि देश का व्यापार घाटा बढ़कर 30.43 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। ऐसी स्थिति में निर्यातक भविष्य में रुपये के और कमजोर होने की आशंका में अपनी डॉलर की कमाई को रोककर रख रहे हैं, जबकि आयातक अपने नुकसान से बचने के लिए आक्रामक रूप से डॉलर खरीदकर फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट बुक कर रहे हैं। बाजार की यह स्थिति एक ऐसा चक्र बना रही है जो भारतीय मुद्रा पर निरंतर गिरावट का दबाव बनाए हुए है।
तकनीकी चार्ट पर कमजोर स्थिति और भविष्य का आउटलुक
आने वाले समय के लिए बाजार विशेषज्ञों का अनुमान मिला-जुला है। कुछ विश्लेषकों को उम्मीद है कि आगामी महीनों में विदेशी फंडों के आगमन से रुपये को कुछ राहत मिल सकती है, जिससे यह वापस 95 रुपये प्रति डॉलर के स्तर के नीचे आ सकता है। हालांकि, तकनीकी विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि दैनिक और साप्ताहिक चार्ट पर डॉलर का दबदबा बेहद मजबूत बना हुआ है। यदि आने वाले दिनों में रुपया 97 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर जाता है और वहां खुद को संभाल नहीं पाता है, तो तकनीकी गिरावट इसे 98 से लेकर 98.70 रुपये प्रति डॉलर के बेहद चिंताजनक स्तर तक भी धकेल सकती है।


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