नागचंद्रेश्वर के दुर्लभ दर्शन, साल में एक बार मिलता है पुण्य अवसर
उज्जैन: 29 जुलाई को नागपंचमी पर्व मनाया जाना है. विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग बाबा महाकाल मंदिर के शिखर पर विराजमान नागचंद्रेश्वर साल में एक बार दर्शन देते हैं. जिस प्रतिमा के दर्शन के लिए भक्त देश दुनिया से उज्जैन पहुंचते हैं, एक झलक पाने के लिए लालायित रहते हैं. कितनी प्राचीन ये प्रतिमा है, कहां से लाई गई, कब स्थापित की गई, क्या खासियत है. क्या ये मंदिर प्राचीन काल से साल में 1 बार खुलता आया है या फिर 12 महीनों ये मंदिर खुला रहता था. वक्त के साथ 1 दिन की परंपरा कैसे शुरू हुई. इस रिपोर्ट में पढ़िए.
5 खण्ड में है शिखर
महाकाल मंदिर के महेश पुजारी बताते हैं कि "महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर 5 खंडों में बना हुआ है. सबसे नीचे स्वयं भू शिव विराजमान हैं महाकाल रूप में, उनके ऊपर ओमकारेश्वर विराजमान हैं. वहीं कंडे की राख से भस्म बनाने के लिए एक खण्ड अलग से है और उनके ऊपर सिध्देश्वर शिवलिंग और दुर्लभ नागचंद्रेश्वर प्रतिमा स्वरूप में एक ही जगह पास-पास में विराजमान है और सबसे ऊपर शिखर है."
60 वर्षों से मन रहा मंदिर में नागचंद्रेश्वर पर्व?
महेश पुजारी बताते हैं कि "महाकाल मंदिर में ये उत्सव बीते 60 वर्षों से मनाया जा रहा है. इससे पूर्व क्षिप्रा नदी के श्रीराम घाट पर राम सीढ़ी के यहां नागचंद्रेश्वर की प्रतिमा है वहीं पूजन होता था और वहीं मेला लगता था नागपंचमी पर. समय के साथ दुर्लभ प्रतिमा आई और उसका पूजन होने लगा. शेष शैय्या पर हमने अब तक विष्णु को ही विराजमान देखा होगा लेकिन यहां लगी प्रतिमा में शेष शैय्या पर शिव परिवार है. शेष शैय्या पर उमा महेश्वर, कार्तिक स्वामी, गणेश, सिंह, सूर्य, चंद्रमा, नंदी भी दिखाई देते हैं."
250 वर्ष पुरानी प्रतिमा?
दिल्ली विश्वविद्यालय इतिहास विभाग के सहायक प्राध्यापक पुराविद शुभम केवलिया बताते हैं कि "नाग पूजा का भारत में प्राचीन प्रचलन है. भारत के किसी कोने में चले जाएं आपको पूजन होते हुए दिखेगा. विश्व धरोहर स्थल रानी की वाव में भी नागपूजन के साक्ष्य मिलते हैं. लेकिन बात श्री महाकाल मंदिर के शिखर पर विराजमान नागचंद्रेश्वर की करें तो जो प्रतिमा है वह स्टेट पीरियड की प्रतिमा है. यह लगभग 250 साल पुरानी प्रतिमा है.
प्रतिमा में उमा महेश्वर, नाग का अंकन है. कोई कहता है नेपाल से लाई गई, कोई कहता है यहीं गढ़ी गई लेकिन ये प्रतिमा स्टेट पीरियड की है और 250 वर्ष पूर्व की अति दुर्लभ प्रतिमा है जो और कहीं अभी तक नहीं देखी गई. कब लाई गई या यही गढ़ी गई, इसका कोई प्रमाण भी दिखाई नहीं देता कहीं."
12 महीने खुला रहता था मंदिर?
मंदिर के महेश पुजारी बताते हैं कि "60 साल पहले ये मंदिर 12 महीने खुला रहता था. आसानी से भक्त ऊपर विराजमान सिध्देश्वर शिवलिंग के दर्शन लाभ लिया करते थे लेकिन बाद में दुर्लभ प्रतिमा नागचंद्रेश्वर की आई और प्रचार प्रसार हुआ. मंदिर 12 महीने के लिए खुला रहता था और शिखर के यहां से आसानी से श्रद्धालुओं का सीढ़ियों से आना जाना था. मंदिर के स्ट्रक्चर और हादसों की संभावना के चलते इसे साल में एक बार खोलने का निर्णय लिया गया तभी से ये परंपरा शुरू हुई."


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