ईंधन कीमतें बढ़ीं तो सुधरी तेल कंपनियों की वित्तीय सेहत
नई दिल्ली। देश में ईंधन का वितरण करने वाली सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के लिए राहत भरी खबर आई है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी के चलते पेट्रोल की बिक्री पर होने वाले वित्तीय घाटे में 83 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इसके साथ ही डीजल पर होने वाला नुकसान भी 75 फीसदी तक कम हो गया है। इस बात की आधिकारिक जानकारी केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा साझा की गई है। मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने सोमवार को विवरण देते हुए बताया कि पेट्रोल और डीजल पर होने वाली अंडर-रिकवरी (लागत के मुकाबले कम वसूली) में पहले की तुलना में भारी सुधार हुआ है। हालांकि, राहत के इन दावों के बीच उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) सिलेंडर की बिक्री पर तेल कंपनियों को अब भी एक बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, इन कंपनियों को प्रत्येक लीटर पेट्रोल बेचने पर 30 रुपये और हर लीटर डीजल की बिक्री पर 27 रुपये का घाटा सहना पड़ रहा है, जबकि इसी साल 1 अप्रैल 2026 को यह घाटा पेट्रोल पर 24 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 105 रुपये प्रति लीटर के ऊंचे स्तर पर बना हुआ था।
चार बार की मूल्य वृद्धि से संभले हालात
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम घटने और घरेलू मोर्चे पर पेट्रोल व डीजल की कीमतों में हाल ही में की गई चार दौर की बढ़ोतरी की बदौलत इंडियन ऑयल (IOC), हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) और भारत पेट्रोलियम (BPCL) जैसी दिग्गज सार्वजनिक कंपनियों के नुकसान के ग्राफ में गिरावट आई है। इस सुधार के बावजूद तेल कंपनियों की वित्तीय सेहत पूरी तरह पटरी पर नहीं लौटी है और उन्हें वर्तमान में भी प्रतिदिन लगभग 600 करोड़ रुपये का भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। हालांकि, यह स्थिति बीते 18 मई के आंकड़ों से बेहतर है, जब कंपनियों का दैनिक घाटा 750 करोड़ रुपये के स्तर को छू रहा था।
चालू वित्तीय वर्ष में घाटे का ग्राफ गिरा
यदि चालू वर्ष में 1 अप्रैल के शुरुआती आंकड़ों से वर्तमान स्थिति की तुलना की जाए, तो तीनों प्रमुख तेल विपणन कंपनियों के कुल घाटे में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, इस निर्धारित समय सीमा के भीतर पेट्रोल के व्यापार में होने वाले नुकसान को 83 फीसदी तक समेटने में सफलता मिली है। ठीक इसी तरह, डीजल के कारोबार में कंपनियों को मिलने वाले वित्तीय झटके में भी 75 प्रतिशत तक की बड़ी राहत देखने को मिली है, जिससे सरकारी खजाने और कंपनियों दोनों ने थोड़ी राहत की सांस ली है।
समझें क्या होती है अंडर-रिकवरी
आर्थिक और पेट्रोलियम क्षेत्र में 'अंडर-रिकवरी' एक तकनीकी शब्दावली है, जिसका सीधा संबंध कंपनियों की लागत और मुनाफे से होता है। सरल शब्दों में कहें तो जब तेल कंपनियां रिफाइनरी से पेट्रोल या डीजल तैयार करती हैं, तो उसकी एक कुल वास्तविक लागत तय होती है। इसके बाद जब इस ईंधन को खुदरा बाजार में उपभोक्ताओं को बेचा जाता है, तो उससे मिलने वाली राशि और वास्तविक लागत के बीच जो अंतर (कमी) रह जाता है, उसे ही तकनीकी भाषा में अंडर-रिकवरी या साधारण शब्दों में कंपनियों का घाटा कहा जाता है।


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