MP बार काउंसिल चुनाव: धूलिया कमेटी ने निरस्तीकरण को दी मंजूरी
जबलपुर: मध्यप्रदेश स्टेट बार काउंसिल के आगामी 12 मई को होने वाले चुनावों में एक बड़ा उलटफेर सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जस्टिस सुधांशु धूलिया कमेटी ने स्पष्ट कर दिया है कि बार एसोसिएशनों के वर्तमान पदाधिकारी चुनाव लड़ने के पात्र नहीं होंगे। इस आदेश के बाद जबलपुर के 4 दिग्गजों सहित प्रदेश भर के कुल 11 पदाधिकारियों की उम्मीदवारी खत्म हो गई है।
विवाद की जड़: BCI का नियम और अधिसूचना में देरी
इस पूरे मामले के केंद्र में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) का वह नियम है, जो एक साथ दो पदों पर रहने (स्टेट बार काउंसिल और स्थानीय बार एसोसिएशन) को प्रतिबंधित करता है।
- सुप्रीम कोर्ट का रुख: हालांकि शीर्ष अदालत ने इस नियम को अनुचित मानकर बीसीआई को संशोधन के निर्देश दिए थे, लेकिन तकनीकी पेंच तब फंसा जब पता चला कि संशोधित नियमों की आधिकारिक अधिसूचना अभी तक जारी नहीं हुई है।
- उम्मीदवारों का तर्क: हाईकोर्ट बार अध्यक्ष डीके जैन और जिला बार अध्यक्ष मनीष मिश्रा सहित कई उम्मीदवारों ने इस उम्मीद में नामांकन भरा था कि जीतने के बाद वे एक पद छोड़ देंगे, लेकिन नियम लागू न होने से उनकी दलीलें खारिज हो गईं।
धूलिया कमेटी की सख्त टिप्पणी
- मंगलवार रात वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई सुनवाई में जस्टिस धूलिया कमेटी ने साफ किया कि:
- जब तक कोई नया नियम आधिकारिक रूप से अधिसूचित नहीं होता, तब तक उसे अस्तित्व में नहीं माना जा सकता।
- वर्तमान स्थिति में पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे।
- हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र में भी इसी आधार पर नामांकन रद्द किए गए हैं, इसलिए मध्यप्रदेश के लिए अलग मापदंड नहीं अपनाए जा सकते।
कुल 19 नामांकन खारिज, चुनावी समीकरण बदले
राज्य चुनाव समिति ने कमेटी के दिशा-निर्देशों पर अमल करते हुए कुल 19 उम्मीदवारों को दौड़ से बाहर कर दिया है:
- 11 पदाधिकारी: जो वर्तमान में किसी न किसी बार निकाय में पद पर आसीन हैं।
- 8 अन्य: जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं या अनुशासनहीनता से जुड़े प्रकरण विचाराधीन हैं।
पदाधिकारियों ने जताई आपत्ति
नामांकन निरस्त होने पर मप्र हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष डीके जैन ने कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि यह नियम 2016 से प्रभावी है, लेकिन पिछले 10 वर्षों के दो चुनावों में इसे कभी लागू नहीं किया गया। प्रभावित उम्मीदवारों का तर्क है कि अधिसूचना के प्रकाशन में प्रशासनिक देरी का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है। कई दिग्गजों ने इस फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई जारी रखने के संकेत दिए हैं।


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