‘मौत का पुल’ हादसा: अंधेरी रात और आंधी-तूफान में बड़ा हादसा
हमीरपुर: जिले में बेतवा नदी पर बन रहे पुल के धराशायी होने से कई परिवारों को कभी न भूलने वाला दर्द मिला है। स्वासा ग्रामीण क्षेत्र के रहने वाले राजेंद्र सिंह के लिए यह हादसा एक ऐसा जख्म बन गया है जो ताउम्र नहीं भरेगा। प्रकृति के इस तांडव के बीच वह अपने कलेजे के टुकड़े, पुष्पेंद्र की अंतिम चीख तक नहीं सुन पाए। राजेंद्र सिंह इसी निर्माणाधीन पुल पर सुरक्षाकर्मी (गनमैन) के रूप में तैनात हैं।
चूंकि राजेंद्र के पास लाइसेंसी हथियार था, इसलिए ठेकेदार ने उन्हें सुरक्षा का जिम्मा सौंपा था। बाद में उन्होंने अपने बेटे पुष्पेंद्र को भी इसी साइट पर गार्ड की नौकरी दिलवा दी। पिता-पुत्र दोनों रात की पाली में साथ ड्यूटी करते थे। रोज की तरह गुरुवार रात भी दोनों काम पर थे, तभी अचानक मौसम ने करवट ली और धूलभरी आंधी के साथ बारिश शुरू हो गई।
लापरवाही और कुदरत की मार: पिता के सामने मलबे में दबा बेटा
अचानक आई आंधी से अपनी बंदूक को भीगने से बचाने के लिए राजेंद्र ने उसे बेटे पुष्पेंद्र को सौंप दिया। पुष्पेंद्र बंदूक लेकर पास में ही खड़ी हाइड्रा मशीन के केबिन में बैठ गया, जबकि राजेंद्र खुद को छुपाने के लिए सुरक्षित जगह तलाशने लगे। इसी दौरान तेज हवा के झोंके से राजेंद्र का पैर फिसल गया और वह सीधे नदी में जा गिरे। जब वह किसी तरह पानी से बाहर निकलकर ऊपर आए, तभी एक जोरदार धमाका हुआ। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो पुल का एक भारी-भरकम स्लैब भरभराकर नीचे गिर चुका था।
जिस जगह वह स्लैब गिरा, ठीक उसी के नीचे वह हाइड्रा मशीन खड़ी थी जिसमें पुष्पेंद्र मौजूद था। यह खौफनाक मंजर देखकर राजेंद्र बदहवास हो गए। उन्होंने रोते हुए कहा, "आंधी और तूफान का शोर इतना ज्यादा था कि मेरे बच्चे की आवाज मुझ तक पहुंच ही नहीं सकी।" इस हादसे के बाद से पूरे इलाके में सन्नाटा पसरा हुआ है।
"पापा कहते थे मेरी बेटियां ही मेरे बेटे हैं"
इस दर्दनाक हादसे ने अचपुरा गांव के रहने वाले गनमैन राजेश पाल के परिवार को भी तबाह कर दिया है। जैसे ही दुर्घटना की खबर घर पहुंची, राजेश की चारों बेटियां बदहवास हालत में घटना स्थल की ओर दौड़ पड़ीं। मलबे के बीच अपने पिता को ढूंढती बेटियों की चीख-पुकार से वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं।
बड़ी बेटी शिवानी ने रोते हुए बताया, "हमारा कोई भाई नहीं है, लेकिन पापा हमेशा कहते थे कि मेरी बेटियां ही मेरे बेटे हैं। उन्होंने हमें बेटों से बढ़कर प्यार दिया।" राजेश अपनी दोनाली बंदूक के दम पर गनमैन की नौकरी कर घर चलाते थे और बेटियों की पढ़ाई का खर्च उठाते थे। हाल ही में जब छोटी बेटी रेखा का इंटर का रिजल्ट आया था, तो राजेश 65 फीसदी अंक आने पर पूरे गांव में मिठाई लाए थे। आज पिता के अचानक चले जाने से इन बेटियों के भविष्य पर अंधकार छा गया है।
रोजगार की तलाश में आए दो दोस्तों की एक साथ मौत
हादसे का शिकार हुए बांदा जिले के भूरागढ़ निवासी सावंत (गंगाचरण यादव) और सभाजीत आपस में गहरे दोस्त थे। दोनों बीते 27 मई को ही गांव से पैसे कमाने की बात कहकर घर से निकले थे। ठेकेदार ने दोनों को तुरंत काम पर रख लिया था। गुरुवार की रात दोनों दोस्त पुल पर एक साथ काम कर रहे थे और इस हादसे में दोनों ही मलबे के नीचे दब गए।
सावंत के पिता सोबरन सिंह ने रोते हुए कहा, "मैं कितना बदनसीब पिता हूँ कि तीन दिन पहले जिसे कमाकर लौटने की दुआ देकर भेजा था, आज उसका शव लेकर गांव जा रहा हूँ।" वहीं सभाजीत के पिता नीलकंठ भी इस सदमे से पूरी तरह टूट चुके हैं। पोस्टमार्टम के बाद जब दोनों दोस्तों के शवों को एक ही एम्बुलेंस में रखा गया, तो वहां खड़े लोगों की रुलाई फूट पड़ी। लोग कहने लगे कि दोनों दोस्त जिंदा भी एक साथ थे और दुनिया से गए भी एक साथ।


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