भारतीय निर्यातकों की वैश्विक मौजूदगी बढ़ाने को 2500 करोड़ रुपये की सिफारिश
व्यापार: सरकार को बाजार पहुंच पहल (एमएआई) के तहत वैश्विक प्रदर्शनियों में भाग लेने के लिए निर्यातकों को 2,500 करोड़ रुपये आवंटित करने पर विचार करना चाहिए। एमएआई को इस वित्त वर्ष में कोई धनराशि नहीं मिली है। आर्थिक थिंक टैंक जीटीआरआई ने निर्यात संवर्धन निधि में गिरावट पर चिंता व्यक्त करते हुए यह बात कही है। जीटीआरआई ने कहा कि निर्यातकों ने अप्रैल से अगस्त के बीच वैश्विक प्रदर्शनियों में भाग लेने के महत्वपूर्ण अवसर गंवा दिए हैं।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा, "पिछले वर्षों में केवल 250 करोड़ रुपये के मामूली बजट के साथ, यह योजना 440 अरब डॉलर से अधिक की निर्यात अर्थव्यवस्था के लिए पहले से ही बहुत छोटी थी। इसे सालाना 2,500 करोड़ रुपये के बड़े बजट के साथ फिर से शुरू किया जाना चाहिए। इसमें कम से कम एक साल पहले धनराशि जारी की जानी चाहिए ताकि भारतीय फर्मों को वैश्विक मेलों में उच्च-दृश्यता वाले स्लॉट सुरक्षित करने का मौका मिल सके।"
उन्होंने अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के बीच निर्यात को बढ़ावा देने के लिए ब्याज समानीकरण योजना (आईईएस) को फिर से शुरू करने, निर्यात संवर्धन मिशन (ईपीएम) को तुरंत लागू करने और ई-कॉमर्स निर्यात केंद्रों की स्थापना का भी आह्वान किया।
इसके अलावा, श्रीवास्तव ने सीमा शुल्क निकासी में तेजी लाने, निर्यातित उत्पादों पर शुल्कों और करों की छूट योजना के लाभों को पूर्वानुमानित बनाने और अग्रिम प्राधिकरण योजना को सरल बनाने की सिफारिश की।
उन्होंने कहा, "विदेशी प्रदर्शनियों में भाग लेने में निर्यातकों की मदद करने वाले एमएआई को वित्त वर्ष 2025 में कोई धनराशि नहीं मिली है, जो दशकों में पहली ऐसी चूक है। नतीजतन, निर्यातकों ने अप्रैल और अगस्त के बीच महत्वपूर्ण अवसरों को गंवा दिया, और अगर बाद में धनराशि जारी भी की जाती है, तो 1-2 साल पहले बुक किए गए प्रमुख प्रदर्शनी स्थल अब उपलब्ध नहीं होंगे।"
उन्होंने कहा कि अप्रैल 2025 से ब्याज समतुल्यीकरण योजना (आईईएस) के निलंबन से एमएसएमई निर्यातकों को उच्च वित्तपोषण लागत से जूझना पड़ रहा है, जबकि पहले इस योजना के तहत उन्हें 5-7 प्रतिशत कम ब्याज दर मिलती थी। उन्होंने कहा, "इससे कपड़ा, चमड़ा, हस्तशिल्प और इंजीनियरिंग सामान जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता खत्म हो गई है।" उन्होंने कहा कि लागत लाभ को बहाल करने और पूर्वानुमान सुनिश्चित करने के लिए, सभी निर्यातों को कवर करने के लिए आईईएस को बहाल किया जाना चाहिए और इसका विस्तारित वार्षिक बजट 15,000 करोड़ रुपये और पांच साल की प्रतिबद्धता होनी चाहिए।
जीटीआरआई ने कहा कि इसके अलावा, फरवरी 2023 में घोषित ई-कॉमर्स निर्यात केंद्र स्थापित करने की नीति आगे नहीं बढ़ी है, क्योंकि शिपमेंट की अनुमति देने के लिए कोई बुनियादी ढांचा या दिशानिर्देश नहीं हैं। समें कहा गया है कि तत्काल रूप से केन्द्रों को चालू करने से कुछ ही वर्षों में 10-15 बिलियन अमेरिकी डॉलर का अतिरिक्त वार्षिक निर्यात प्राप्त हो सकता है। उन्होंने कहा कि सीमा शुल्क के मोर्चे पर निर्यातकों को बंदरगाहों पर गंभीर अक्षमताओं का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र रूप से वर्ष भर निगरानी करने से निर्यात मूल्य में लॉजिस्टिक्स लागत में 5-7 प्रतिशत की कमी आ सकती है।
चिंता व्यक्त करते हुए श्रीवास्तव ने कहा कि निर्यात संवर्धन निधि में लगातार गिरावट आई है, जिससे छोटे और मध्यम आकार के निर्यातकों के लिए समर्थन कमजोर हुआ है।
जीटीआरआई के अनुसार एमईआईएस योजना में 45,000 करोड़ रुपये का परिव्यय था, जिससे 40,000 निर्यातकों को लाभ हुआ था, लेकिन इसे 2020 में समाप्त कर दिया गया और इसकी जगह मात्र 20,000 करोड़ रुपये के साथ आरओडीटीईपी और आरओएससीटीएल को लाया गया।
उन्होंने सुझाव दिया, "अधिकांश धनराशि पीएलआई योजना में स्थानांतरित कर दी गई, जिससे 100 से भी कम फर्मों को लाभ हुआ है और धन का वितरण सीमित है। संतुलन बहाल करने के लिए, भारत को व्यापक निर्यात योजनाओं के लिए प्रतिवर्ष अधिक धनराशि आवंटित करनी चाहिए, जिससे एमएसएमई के लिए व्यापक समर्थन सुनिश्चित हो सके और साथ ही बड़े क्षेत्रों के लिए पीएलआई जारी रहे।"
उन्होंने कहा कि नए बाजारों के लिए निर्यात में विविधता लाना रातोंरात संभव नहीं होगा, लेकिन पुनर्जीवित योजनाओं, सुव्यवस्थित प्रक्रियाओं और विस्तारित वित्त पोषण के माध्यम से लागत में 5-10 प्रतिशत की कटौती करके भारत निर्यातकों के लिए समय और स्थान खरीद सकता है, ताकि वे धीरे-धीरे अमेरिकी बाजार से आगे विस्तार कर सकें।


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