हिमालय में कम बर्फबारी से गहराया पर्यावरण संकट, लाखों लोगों का जीवन खतरे में
जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान और पश्चिमी विक्षोभों की कमजोरी प्रमुख कारण
नई दिल्ली। हिमालय प्रदेश में बर्फबारी कम होने से पर्यावरण का संकट गहराता जा रहा है। हिमालय के ग्लेशियरों से 12 नदी बेसिनों को पानी मिलता है। इनमें पानी खत्म होने से जीवन पर खतरा मंडरा सकता है। हिमालय में सर्दियों के मौसम में बर्फ़बारी घट रही है। वैज्ञानिक अध्ययनों और मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक यह गिरावट केवल एक साल की घटना नहीं बल्कि लंबे समय से जारी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान और पश्चिमी विक्षोभों की कमजोरी इसके प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं, जिसका असर करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा और पर्यावरण पर पड़ रहा है। पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय में पिछले कुछ दशकों में सर्दियों के मौसम का स्वरूप ही बदल गया है। जहां पहले दिसंबर से फरवरी तक पहाड़ मोटी बर्फ की चादर से ढक जाते थे, वहीं अब कई इलाकों में पहाड़ पथरीले नजर आने लगे हैं।
बता दें 1980 से 2020 के औसत आंकड़ों की तुलना में पिछले पांच सालों में बर्फबारी में स्पष्ट कमी दर्ज की गई है। बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण बर्फ गिरने की मात्रा कम हो रही है और जो थोड़ी-बहुत बर्फ गिरती भी है, वह पिघल जाती है। निचले हिमालयी इलाकों में बर्फबारी की जगह बारिश होने लगी है, जो सर्दियों के लिए असामान्य मानी जाती है। वैज्ञानिक चेता रहे हैं कि हिमालय में ‘स्नो ड्रॉट’ यानी बर्फ का सूखा जैसी स्थिति पैदा हो रही है। सर्दियों में जमा होने वाली बर्फ वसंत के मौसम में पिघलकर नदियों का मुख्य स्रोत बनती है। यही पानी पीने, सिंचाई और हाइड्रोपावर के लिए अहम होता है।
रिपोर्ट के मुताबिक कम बर्फबारी का मतलब है कि आने वाले महीनों में नदियों में पानी की उपलब्धता घट सकती है। इसके अलावा सूखी परिस्थितियों के कारण जंगलों में आग लगने का खतरा भी बढ़ रहा है। विशेषज्ञ कहते हैं कि बर्फ और हिमालयी ग्लेशियर पहाड़ों को मजबूती देते हैं। इनके घटने से चट्टानें अस्थिर हो रही हैं, जिससे भूस्खलन, ग्लेशियर झीलों के फटने और मलबा बहने जैसी आपदाएं पहले से ज़्यादा आम हो गई हैं। भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक दिसंबर महीने में करीब पूरे उत्तर भारत में बारिश और बर्फबारी न के बराबर रही। विभाग का अनुमान है कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख समेत उत्तर-पश्चिमी भारत में जनवरी से मार्च के बीच लंबी अवधि के औसत की तुलना में बारिश और बर्फबारी में करीब 86 फीसदी तक की कमी हो सकती है।
सिर्फ भारत ही नहीं नेपाल जैसे केंद्रीय हिमालयी देशों में भी यही स्थिति है। वहां पिछले कई सालों से सर्दियों में बारिश और बर्फबारी कम हो रही है। कुछ इलाकों में हाल के वर्षों में भारी बर्फबारी की घटनाएं जरूर हुई, लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि ये सामान्य मौसमी प्रक्रिया नहीं बल्कि अस्थिर और चरम मौसम की घटनाएं हैं। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक सर्दियों में उत्तर भारत और हिमालय में होने वाली अधिकांश बारिश और बर्फबारी पश्चिमी विक्षोभों के कारण होती है। ये भूमध्यसागर से आने वाले कम दबाव वाले सिस्टम होते हैं, जो ठंडी हवा और नमी लेकर आते हैं। हाल के वर्षों में ये पश्चिमी विक्षोभ कमजोर पड़े हैं और कुछ मामलों में उत्तर की ओर खिसक गए हैं, जिससे वे अरब सागर से पर्याप्त नमी नहीं ले पा रहे जिससे बारिश और बर्फबारी घट रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही इन बदलावों के सटीक कारणों पर शोध जारी है, लेकिन यह साफ है कि हिमालय दोहरे संकट से जूझ रहा है- एक ओर ग्लेशियर पिघल रहे हैं और दूसरी ओर नई बर्फ का जमाव कम हो रहा है। इसके दीर्घकालिक परिणाम हिमालय ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए गंभीर साबित हो सकते हैं।


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