हादसे का खौफनाक मंजर: एक हाथ-पैर से बह रहा था खून, इंसानियत दिखाते ट्रक ड्राइवर की दास्तान
अहमदाबाद/वडोदरा: गुजरात ब्रिज हादसे के बाद तीन दिन बाद इस दुर्घटना के भयावह मंजर को नदी में गिरे ट्रक चालक ने बयां किया है। 40 साल के गणपतसिंह राजपूत दहेज से कांडला बंदरगाह के लिए एक टैंकर ट्रक में सल्फ्यूरिक एसिड लेकर जा रहे थे, लेकिन मुजपुर-गंभीर पुल पर हुई एक दुखद घटना ने उन्हें मौत के मुंह में ढकेल दिया। किसी तरह से बचे गणपत सिंह ने लहुलुहान होने के बाद भी नरेंद्र सिंह की जान बचाई। गणपत सिंह को अफसोस है कि वह ज्यादा लोगों को नहीं बचा पाए। इस हादसे में अभी 19 लोगों की मौत हुई है, हालांकि लापता लोगों को जोड़कर कुल संख्या 21 तक पहुंचने का अनुमान है।
15 मिनट बाद आया होश
यह हादसा इतना भयावह था कि पुल से नदी में गिरने के बाद गणपतसिंह लगभग 15 मिनट तक बेहोश रहे। उनका शरीर अचानक ठंडा पड़ गया और जब उन्हें होश आया, तो उन्होंने देखा कि वे अपने वाहन समेत कई लोगों के साथ नदी में गिर गए हैं। उन्होंने एक पैर से लात मारकर ट्रक का शीशा तोड़ दिया, ट्रक और पानी से बाहर निकले और पुल के खंभे के पास खुद को सुरक्षित बचाया। उनका एक हाथ और एक पैर गंभीर रूप से घायल हो गए थे और वे लहूलुहान अवस्था में थे। दर्द असहनीय था, उनका शरीर उनका साथ नहीं दे रहा था, फिर भी उनकी नज़र नरेंद्र सिंह परमार पर पड़ी जो महिसागर नदी की तेज़ धारा में तैर रहे थे।
दो दिन बाद नरेंद्र की हुई मौत
अपनी जान की परवाह किए बिना गणपत सिंह ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपने बचे हुए एक हाथ और एक पैर का इस्तेमाल करके नरेंद्र सिंह को बचाने की कोशिश की। तेज़ धारा और शरीर पर गंभीर चोटों के बावजूद, उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने बड़ी हिम्मत से नरेंद्र सिंह को बचाया। हालांकि दुर्भाग्य से घटना के दो दिन बाद ही इलाज के दौरान नरेंद्र सिंह परमार का निधन हो गया। यह गणपत सिंह के लिए बेहद दुखद थी, क्योंकि अपनी जान की परवाह किए बिना उन्होंने जो प्रयास किया, वह सफल नहीं हो सका।
राजस्थान के निवासी गणपत सिंह
गणपत सिंह राजपूत बताते हैं कि वे एक ट्रक ड्राइवर हैं। मैं राजस्थान के उदयपुर जिले के खेड़ा गांव में रहता हूं। और मैं बहुत अच्छा तैराक हूँ क्योंकि गांव एक नदी के किनारे है। अगर उन्हें गंभीर चोटें नहीं आई होतीं, तो वे अपनी तैराकी कला से 7-8 लोगों की जान बचा सकते थे। दो बेहद छोटे बच्चों को बचाना उनकी प्राथमिकता होती। वे कहते हैं कि जब उन्होंने नरेंद्रभाई को बचाया, तो घायल सोनलबेन पढियार समेत अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। गणपत सिंह इस बड़े हादसे में खुद बच गए हैं लेकिन उन्हें मलाल है कि वे छोटे बच्चों को नहीं बचा पाए। जो उनकी आंखों के सामने डूब रहे लोगों में शामिल थे।


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